नई दिल्ली:
मतदाता सूची से लाखों नागरिकों के नाम हटाए जाने और फॉर्म-6 व 7 में कथित प्रशासनिक मनमानी को लेकर छिड़े देशव्यापी सियासी घमासान के बीच देश की सर्वोच्च अदालत ने ऐतिहासिक हस्तक्षेप किया है। 8 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली पर सख्त सवाल उठाते हुए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं कि किसी भी पात्र भारतीय नागरिक का नाम बिना भौतिक सत्यापन (Physical Verification) और व्यक्तिगत लिखित नोटिस दिए मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता।
शीर्ष अदालत की तल्ख टिप्पणी—'वोट का अधिकार संवैधानिक आत्मा':
सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदान का अधिकार केवल एक कागजी औपचारिकता नहीं बल्कि संविधान की मूल आत्मा है। कोर्ट ने कहा कि किसी तकनीकी गड़बड़ी या थोक स्तर पर सॉफ्टवेयर-आधारित एल्गोरिदम के जरिए नागरिकों के नाम मतदाता सूची से गायब होना बेहद गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने आयोग से पूछा कि इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम विलोपित करने से पहले जमीनी स्तर पर बीएलओ (BLO) द्वारा घर-घर जाकर सत्यापन क्यों सुनिश्चित नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 3 सख्त शर्तें:
1. अनिवार्य व्यक्तिगत नोटिस: किसी भी मतदाता का नाम विलोपित करने से पहले उसे रजिस्टर्ड पोस्ट और एसएमएस के जरिए कम से कम 15 दिन का कारण बताओ नोटिस देना अनिवार्य होगा।
2. फिजिकल वेरिफिकेशन का रिकॉर्ड: बीएलओ को उस मतदाता के पते पर जाकर पंचनामे के साथ रिपोर्ट तैयार करनी होगी कि मतदाता वाकई वहां नहीं रहता या उसका निधन हो चुका है।
3. ऑनलाइन पब्लिक डैशबोर्ड: हटाए गए सभी नामों की सूची विधानसभावार पब्लिक डोमेन में जारी की जाएगी, ताकि कोई भी नागरिक या राजनीतिक दल उस पर निर्धारित समय में आपत्ति दर्ज करा सके।
विपक्ष ने बताया लोकतंत्र की जीत, ECI को झटका:
सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े आदेश के बाद संसद से सड़क तक प्रदर्शन कर रहे विपक्षी दलों ने इसे न्याय और जनता की जीत बताया है। विपक्ष का कहना है कि इस आदेश ने साबित कर दिया है कि चुनाव आयोग द्वारा की जा रही प्रक्रिया में भारी खामियां थीं। वहीं, चुनाव आयोग की कानूनी टीम ने कोर्ट को भरोसा दिलाया है कि वह शीर्ष अदालत द्वारा जारी विस्तृत दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन करेंगे और इसके क्रियान्वयन पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करेंगे।
जे जनमत लीगल डेस्क:
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